- अरविन्द मोहन
दूसरे खेमे के नेता भाजपा और मुल्क को संभालकर आगे ले जा सकते हों इसमें उनके मुठ्ठी भर दीवाने समर्थकों को छोड़कर किसी को भरोसा नहीं है। औरंगजेब के मकबरे के सवाल पर फड़नवीस और संभल के सवाल पर योगी सरकार के व्यवहार से यह साबित हुआ है कि ये नेता चाहे जितना फड़फड़ाएं, मोदी जी का विकल्प नहीं बन सकते।
नए संवत्सर की शुरुआत पर गुड़ीपड़वा के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री की भेंट का इंतजार बहुत लोगों को था लेकिन जो आधिकारिक बातें निकालकर आईं उनसे ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि भाजपा के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार समेत की बड़े मसलों पर इन दो शीर्षस्थ लोगों के बीच कोई निर्णयात्मक बात हुई। इस बीच अगर शिव सेना के संजय राऊत प्रधानमंत्री के उत्तराधिकारी वाली बहस न छेड़ते तो बातचीत का मसला न्यूज के हिसाब से फीका होकर एक किनारे लग गया होता। संजय राऊत से महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फड़नवीस बहस में उतरे और यह कहा कि न तो भाजपा को कोई उत्तराधिकारी चाहिए और न इस मसले पर कोई चर्चा हुई। उन्होंने इस बात का भी खंडन किया कि मोदी का उत्तराधिकारी महाराष्ट्र से होगा। उनके अनुसार 75 वर्ष पर सक्रिय राजनीति से अलग होने का फैसला प्रधानमंत्री पर लागू नहीं होता और अगले चुनाव में भी नरेंद्र मोदी ही अगुआई करेंगे। संजय राऊत 75 वर्ष वाले मसले को उठाने के साथ फड़नवीस बनाम नितिन गडकरी जैसे सवालों को भी छेड़ रहे थे जो महाराष्ट्र और संघ परिवार की राजनीति के लिए काफी महत्व का है। लेकिन गौर से देखेंगे तो मोदी के उत्तराधिकार और भाजपा के अगले अध्यक्ष का सवाल पूरे मुल्क की राजनीति के हिसाब से काफी बड़ा है।
अब ऐसा भी नहीं है कि संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री माइक/कैमरा लगाकर सारी चर्चा करते और हम आप सभी उनकी बातचीत और भाव भंगिमा को सीधे देख सुनकर जान जाते। ऐसा होता नहीं है। पर जिस तरह मोदी जी ने भाजपा के अपने से पुराने नेताओं की जमात को 75 पार के नाम पर सिरे से दरकिनार कर दिया उससे यह उत्सुकता तो होनी ही है कि उनका 75 पूरा होने पर क्या होता है। लेकिन इससे भी ज्यादा साफ मसला भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा द्वारा लोक सभा चुनाव के पहले यह कहना था कि अब भाजपा को संघ की जरूरत नहीं है। वह खुद से सक्षम बन चुकी है। संयोग से उसके बाद उनका कार्यकाल भी खत्म होना था और चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन खराब भी रहा। सो जब नई सरकार में उनको मंत्री बना दिया गया तो उन्होंने इस्तीफा दिया और नया अध्यक्ष चुने जाने तक कामचलाऊ अध्यक्ष के रूप में काम किए जा रहे है।
अब साल नजदीक आ रहा है और भाजपा नया अध्यक्ष नहीं चुन पाई है। जो बातें छन-छन कर सामने आती रहीं उनके अनुसार इसमें संघ द्वारा अपनी पसंद का आदमी लाना बड़ी वजह है जिससे साबित हों कि भाजपा अभी भी संघ से अलग नहीं है। दूसरी और व्यावहारिक बात भाजपा के कमजोर होने से संघ का हौसला बढ़ना है। और तब से यह काफी प्रचारित हुआ है कि राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भाजपा ने संघ के सहारे ही हारती बाजी को पलटा है।
इस लेखक की तरह काफी सारे लोग होंगे जिनकी दिलचस्पी भाजपा और संघ के संबंधों में किसके ऊपर और किसके नीचे होने में नहीं है। और यह गलतफहमी भी नहीं रखनी चाहिए कि कभी संघ और भाजपा जुदा होने या एक दूसरे का नुकसान करने जैसी स्थिति में आएंगे। पर हमारी दिलचस्पी नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी में जरूर है और इसका उनके 75 साल का होने से भी कोई मतलब नहीं है। आडवाणी जी, मुरलीमनोहर जोशी, कलराज मिश्र से लेकर रविशंकर प्रसाद तक को जब उनकी सम्पूर्ण सक्रियता और काम करने की इच्छा के बाद भी दरकिनार कर दिया गया तो शायद ही किसी को अच्छा लगा। उनकी भरपाई मोदी जी ने कुछ पूर्व नौकरशाहों और दूसरे क्षेत्र के लोगों को साथ लेकर पूरी की। तीन-तीन चुनाव जितवाने वाले, अपनी सक्रियता और सारी स्थितियों पर पूरा कंट्रोल रखने वाले मोदी जी सिर्फ उम्र की सीमा के चलते किनारे हो जाएं तो यह भी अच्छा नहीं होगा। लेकिन उनके उत्तराधिकार का सवाल उससे ज्यादा बड़ा है। और दस ग्यारह साल के अपने शासन काल में उन्होंने स्थिति खुद भी ज्यादा मुश्किल बना ली है। आज राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी को छोड़कर बाकी कोई नाम नहीं बचा है और अगर वे विकल्प बन सकते हैं तो मोदी में ही क्या हर्ज है।
मोदीजी के विकल्प का सवाल पूरे संघ परिवार या मोदी समर्थक जमात की मौजूदा स्थिति से भी जुदा है और इस लेखक ने जानबूझ कर अमित शाह का नाम दो बड़े लोगों के साथ नहीं जोड़ा क्योंकि उनका नाम आते ही उनके समर्थकों से ज्यादा विरोधी सक्रिय होंगे। वे कभी सारे लोगों या अधिकांश लोगों की पसंद नहीं बन सकते भले आज संगठन और सरकार में वे मोदी के बाद सबसे ताकतवर नेता हैं।
लेकिन ऐसा मोदी जी के समर्थन और रणनीति के चलते है। असल में यह पूरा जमात आज दो धड़ों में बंटता दिखता है और शाह जी सिर्फ एक धडे को मान्य लगते हैं। वे कमोबेश मोदी जी की छाया बनाकर रह गए हैं, अपना आधार बनाना भूल गए हैं या उनका वैसा आधार नहीं रहा है. दूसरी ओर हिन्दुत्व की ज्यादा उग्र नई भाषा बोलने के उस्ताद योगी आदित्यनाथ और फड़नवीस ही नहीं भाजपा के ज्यादातर मुख्यमंत्री अपने-अपने आधार के साथ उसमें वृद्धि करते जा रहे हैं। अगर गोपनीय नाम वाले सोशल मीडिया समूहों की चर्चा को जरा भी भरोसेमंद मानें तो राजनाथ, गडकरी, शाह, नड्डा, शिवराज समेत सारे नरमपंथी हिंदुत्ववादी आज 'रायताज' खेमे में आ गए हैं. योगी, फड़नवीस, मोहन द्वय समेत ज्यादा उग्रवादी भाषा बोलने और बुलडोजर को राजनैतिक हथियार बनाने वाले नेता 'ट्रेडस' अर्थात असली ट्रेडिशनलिस्ट हैं। ट्रम्प समर्थक और विरोधियों वाला यह वर्गीकरण आज यहां भी आ गया है। आज तो संघ का पूरा नेतृत्व ही पहले खेमे में गिना जाने लगा है।
यह भी सच है कि दूसरे खेमे के नेता भाजपा और मुल्क को संभालकर आगे ले जा सकते हों इसमें उनके मुठ्ठी भर दीवाने समर्थकों को छोड़कर किसी को भरोसा नहीं है। औरंगजेब के मकबरे के सवाल पर फड़नवीस और संभल के सवाल पर योगी सरकार के व्यवहार से यह साबित हुआ है कि ये नेता चाहे जितना फड़फड़ाएं, मोदी जी का विकल्प नहीं बन सकते। यह भी तय है कि ये लोग मोदी को छोड़कर किसी और को नेता नहीं मान सकते। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में लोक सभा चुनाव में जब इनको महत्व नहीं मिला तो भाजपा का प्रदर्शन इस बात की गवाही है कि इनको पार्टी को नुकसान करने में भी कोई परहेज नहीं रहता। इनके अपने से देश और पार्टी नहीं चलेगी लेकिन ये मोदी के अलावा किसी और नाम पर सहमत नहीं हों सकते। दूसरी ओर कथित 'रायताज' अर्थात उदारवादी धडे के किसी नेता द्वारा इनको अपने साथ रख पाना उससे भी ज्यादा मुश्किल है। कार्यक्षमता और सैद्धांतिक पोजीशन से नेतृत्व पाने और मनवाने के दिन तो काफी पहले से लद गए हैं। ऐसे में मोदी है तभी तक मौजूदा स्वरूप में भाजपा और सरकार का चलना मुमकिन है।